Chhattisgarh Tarkash 2026: मंत्रिमंडल, सोशल मीडिया और सरगुजा

Chhattisgarh Tarkash 2026: मंत्रिमंडल, सोशल मीडिया और सरगुजा

तरकश, 7 जून 2026

संजय के. दीक्षित

मंत्रिमंडल: परफॉर्मेंस और परसेप्शन

विष्णुदेव साय मंत्रिमंडल में फेरबदल इस महीने होगा या जुलाई फर्स्ट वीक तक, इस पर अभी कुछ क्लियरिटी नहीं है। मगर सोशल मीडिया में अटकलों का बाजार गर्म है। हालांकि, बीेजेपी की सियासत में इस समय एक कान को पता नहीं होता…कि दूसरे कान में…, तो फिर मंत्री कौन बनेगा, कौन होगा आउट, इसकी भविष्यवाणी करना मुमकिन नहीं। बहरहाल, परफॉर्मेंस और परसेप्शन के आधार पर ये जरूर कहा, सुना और माना जा रहा कि मंत्रिमंडल की सर्जरी में सबसे अधिक खतरा सरगुजा संभाग को रहेगा। मुख्यमंत्री को छोड़ दें, तब भी बस्तर की तुलना में सरगुजा में चार गुना मंत्री हैं। जाहिर है, फेरबदल में इस असंतुलन को दूर किया जाएगा।

खतरे में ये मंत्री

सरगुजा के चार में से तीन की रिपोर्ट्स अच्छी नहीं आ रही है। इसकी बड़ी वजह खराब परफार्मेंस के साथ रिकार्डतोड़ करप्शन है। सरगुजा के कई मंत्रियों को लग रहा…शायद यह मौका फिर मिले न दोबारा…सो, आईपीएल अंदाज़ में बैटिंग चल रही। खुफिया एजेंसियां भी इसकी तस्दीक कर रही हैं…अपडेट्स भी लगातार दिल्ली जा रहे हैं। खैर, परफॉर्मेंस और परसेप्शन की बात करें तो 12 में से पांच मंत्रियों की विदाई निश्चित लग रही है। बीजेपी के शीर्ष लीडर भी मानते हैं… तभी 2028 के सियासी रण में बीजेपी दमदारी से उतर पाएगी।

आईपीएस डेपुटेशन पर!

छत्तीसगढ़ के नक्सल चीफ और एडीजी आर्म्स फोर्स विवेकानंद प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली जा सकते हैं। पता चला है, उन्होंने सेंट्रल डेपुटेशन के लिए अप्लाई किया था। उसके लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने छत्तीसगढ़ सरकार से एनओसी मांगा है। 96 बैच के आईपीएस अधिकारी विवेकानंद इससे पहले एसपीजी में प्रतिनियुक्ति पर रह चुके हैं। बहरहाल, प्रश्न यह है कि राज्य सरकार ने डीजीपी अरुणदेव गौतम की पोस्टिंग में चकरी चलाते हुए आठ महीने में समेट दिया है। अगले साल 4 फरवरी को गौतम का दो बरस का टेन्योर खतम हो जाएगा। इसके बाद डीजीपी के प्रबल दावेदारों में विवेकानंद भी होंगे। विवेकानंद पिछले सात साल से नक्सल देख रहे हैं। उनके कार्यकाल में छत्तीसगढ़ से नक्सलियों का खात्मा हुआ है। उन्हें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर्सनली जानते हैं। फिर ऐसे गोल्डन टाईम में क्या उन्हें डेपुटेशन पर जाना चाहिए? एक संभावना यह भी है कि उन्होंने डीजीपी के आदेश निकलने से पहले डेपुटेशन के लिए अप्लाई कर दिया होगा। मगर अब वे क्या सोच रहे, कुछ नहीं कहा जा सकता। उधर, बस्तर आईजी सुंदरराज के लिए भी केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एनओसी मांगा है। बस्तर में 15 जून के बाद बारिश शुरू हो जाएगी। बारिश में नक्सलियों का मूवमेंट कम हो जाता है। इसके बाद सुंदरराज कभी भी दिल्ली रवाना हो जाएंगे।

कॉकरोच पार्टी, युवा नेताओं की मौज

सुप्रीम कोर्ट के कई बड़े असहज करने वाले फैसलों से बीजेपी और उसकी सरकारों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा मगर शीर्ष अदालत से अनजाने में निकले एक शब्द ने भाजपा को बैकफुट पर ला खड़ा किया है। कॉकरोच पार्टी के ऑनलाइन गठन से बीजेपी इसलिए डिफेंसिव है कि केंद्र समेत डेढ़ दर्जन राज्यों में उसकी सरकारें हैं। बाकी कांग्रेस की, तो उसके पास कोई खास बचाने के लिए है नहीं। खैर, इस ऑनलाइन पार्टी का भविष्य क्या होगा, ये वक्त बताएगा। अलबत्ता, बीजेपी और उसके पैरोकारों ने अभिजीत दीपके के आम आदमी पार्टी का सदस्य होने और मुस्लिम प्रधानमंत्री की वकालत वाले उसके ट्वीट पर घेरना शुरू कर दिया है। पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया के साथ सीजेपी के संस्थापक की फोटो सोशल मीडिया में वायरल हो रही है। अब, पते की बात यह है कि बीजेपी संगठन और सरकारों में अब युवाओं की पूछपरख बढ़ जाएगी। वैसे, भी बीजेपी एक कदम आगे चलते हुए 44 साल के नितिन नबीन को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया था। अब केंद्र में मंत्रिमंडल के विस्तार में इसका असर दिखेगा, तो छत्तीसगढ़ समेत दीगर राज्यों के कैबिनेट के फेरबदल में युवा विधायकों के लिए संभावनाएं बढ़ेंगी। सिर्फ बीजेपी ही नहीं, बल्कि दीगर सियासी पार्टियों में युवाओं की अहमियत बढ़ेगी।

ईमानदारी…और एफिशियेंट भी

छत्तीसगढ़ में इस समय कलेक्टरों के साथ सचिवों की पोस्टिंगे ठीकठाक हुई हैं। कलेक्टरों में देखा जाए तो दर्जन भर कलेक्टर अच्छी और साफ-सुथरी छबि वाले हैं। मगर सवाल उठता है सिर्फ ईमानदारी ही काफी है? नहीं। रिजल्ट देने के लिए दक्षता, कार्यकुशलता भी जरूरी है। पब्लिक से संवाद और जनता की समस्याओं के प्रति संवेदनशीलता भी चाहिए। छत्तीसगढ़ ने अतीत में कई ऐसे नौकरशाहों को देखा है, सरकार जिन्हें एक बार इशारा कर दें, रिजल्ट की गांरटी होती थी। मगर उसके लिए सिस्टम पर पकड़ जरूरी होता है। नए जमाने के अफसरों में दिक्कत यह है कि एक बड़ा तबका आईएएस बनने के बाद खुद को जमीन से दो इंच उपर समझ बैठता है। और, कहीं उनके साथ ईमानदारी का तगगा लग गया, तब तो करेला और नीम चढ़ा। कलेक्टरों की अपनी पहचान नहीं बन पाने के पीछे ये एक बड़ी वजह है। बहरहाल, ये सिंड्रोम सिर्फ कलेक्टरों में नहीं, मंत्रालय के सचिवों में भी यही स्थिति है। कई ईमानदारी आईएएस कई अहम विभाग लेकर बैठे हैं, मगर उनका परफार्मेंस आज तलक किसी को कुछ दिखा नहीं, और न ही बरसों की सर्विस में वे अपना एक काम बता सकते। ब्यूरोक्रेसी और उसके जिम्मेदार अफसरों को मंथन करना चाहिए कि ब्यूरोक्रेसी के इस वायरस का आखिर निदान क्या है।

सुशासन और कलेक्टर

सवाल फिर कलेक्टरों से…राजा जैसी सुविधाओं का उपभोग करने के बाद कलेक्टर अपने दायित्वों में कितना खरे उतर रहे हैं? इस समय स्थिति यह है कि मुट्ठी भर उत्साही कलेक्टरों को छोड़ दें तो ठीकठाक छबि वाले कलेक्टर भी कुर्सी पर चिपके सिर्फ टाईम काट रहे हैं। कोरबा में अजीत बसंत और बेमेतरा में प्रतिष्ठा ममगई की घटना के बाद ये भ्रांति भी दूर हो गई है कि कलेक्टरों को कोई प्रोटेक्शन नहीं है। इस सरकार में अच्छे अफसरों को संरक्षण दिया जा रहा। इसके बाद भी हालत में कोई सुधार नहीं। मिलियन डॉलर का सवाल कि कलेक्टर अगर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रहे होते तो सरकार को 45 डिग्री की गर्मी में समाधान शिविर लगाने की आवश्यकता पड़ती क्या? एक तरह से कहें तो समस्या निवारण शिविर कलेक्टरों की अक्षमता को प्रतीक है। जाहिर है, कलेक्टर अगर अपनी नाक के नीचे बैठे एसडीएम, तहसीलदार को महीने में एक बार बुलाकर रिव्यू कर लेते तो पब्लिक कलेक्टर से लेकर सरकार तक को वाह-वाह कर उठती।

कलेक्टरों की चार केटेगरी

छत्तीसगढ़ में इस समय चार तरह के कलेक्टर हैं। एक ऑनेस्ट, डेसिंग और रिजल्ट देने वाले। यद्यपि, कलेक्टरों का ये नस्ल इस समय विलुप्ति की ओर अग्रसर है। मुश्किल से होंगे चार-पांच। दूसरा केटेगरी…ईमानदार मगर काम से देहचोरी करने वाले। इस दूसरे केटेगरी वाले का पूरा ध्यान अपनी छबि और कुर्सी बचाने पर टिका होता है। बीच-बीच में डीएमएफ का हिस्सा आ जाए तो रख लो। बाकी फुल डिफेंसिव। तीसरे केटेगरी की तादात ज्यादा है। उसकी नजर काम पर कम, डीएमएफ पर ज्यादा रहती है। आईएएस बनने के बाद ये जीवन में बड़ा आसामी बनने का लक्ष्य लेकर चले थे, वे सही ट्रेक पर, वंदे भारत एक्सप्रेस की गति से दौड़ रहे हैं। अब चौथा केटेगरी…यह मजबूरी का नाम महात्मा गांधी वाला है। क्योंकि, आईएएस हैं, तो कम-से-कम एक जिला तो उन्हें देना ही पड़ेगा। इनमें वे कलेक्टर भी शामिल हैं, जिन्हें आमतौर पर जाति-वर्ग के तराजू पर तौलकर जिलों में भेजा जाता है…ये कितने दिन जिले में रहेंगे, किसी को नहीं पता।

घटना पुरानी मगर मौजूं

बात 2011 के किसी महीने की होगी। बिलासपुर के जूदेव समर्थक युवा नेता का थाने में पुलिस वालों से विवाद हो गया था। उस समय एक तेज-तर्रार आईपीएस बिलासपुर के कप्तान थे। वे घटना से बहुत नाराज हुए…उन्होंने युवा नेता के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दिया। बीजेपी के दिग्गत नेता दिलीप सिंह जूदेव को जब यह पता चला तो दिल्ली से बिलासपुर पहुंच गए। मीडिया से बात करते हुए उन्होंने सिस्टम के खिलाफ फायर खोल दिया। बोले…बिलासपुर में प्रशासनिक आतंकवाद चल रहा है। जूदेव के पास उस समय कोई पद बड़ा नहीं था। सिर्फ सांसद थे। मगर सियासी कद बड़ा था। उनके प्रशासनिक आतंकवाद के शाब्दिक प्रहार से रमन सरकार हिल गई थी। जूदेव की नाराजगी दूर करने उच्च स्तर पर मंत्रणा हुई। उस समय के क्षेत्रीय संगठन मंत्री सौदान सिंह से विमर्श किया गया। फिर सरकार ने सिंगल आर्डर निकाल पुलिस कप्तान को बदल दिया था।

कैडर पर कैंची

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद यह पहली दफा हुआ कि इस बार स्टेट को एक भी आईपीएस नहीं मिला, आईएएस में भी कटौती हो गई है। इस साल सिर्फ दो ही मिलने वाले हैं। जबकि, 2003 के बाद से आईएएस, आईपीएस की संख्या लगातार बढ़ती जा रही थी। जाहिर है, 2002 तक इक्का-दुक्का अफसर मिलते थे, मगर उसके बाद हर बैच में पांच-छह होते ही थे। मगर बताते हैं, अब छत्तीसगढ़ का कोटा फुल हो गया है। यही हाल बाकी राज्यों का भी है। तभी आईएएस की वैकेंसी अब 250 से कम होकर 200 पर आ गई है। आईपीएस में नक्सल स्टेट होने का फायदा मिला। मगर अब नक्सलिज्म भी समाप्त हो गया है। इसलिए, रिक्वायरमेंट का ये आधार पर भी अब खतम हो गया। कुल मिलाकर भारत सरकार आईएएस, आईपीएस की संख्या पर अब लगाम लगाना चाह रहा है।

हफ्ते का कोट

“गुण और गुनाह दोनों की कीमत होती है, अंतर सिर्फ इतना…गुण की कीमत मिलती है और गुनाह की कीमत चुकानी पड़ती है” और “हैसियत आसमान जैसी होनी चाहिए, क्योंकि जमीन कितनी भी महंगी क्यों न हो, लोग उसे खरीद ही लेते हैं।”

अंत में दो सवाल आपसे?

  • 1. इन चर्चाओं में कितनी सच्चाई है…बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष किरण सिंहदेव मंत्री और उनकी जगह तोखन साहू प्रदेश अध्यक्ष बनेंगे?
  • 2. बस्तर आईजी बनने के लिए आईपीएस अफसरों की उत्सुकता क्यों बढ़ गई है?

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