CG School News: सरकारी स्कूल की समितियों से नेतागिरी खत्म, दो लाख दावेदारों को झटका, 40 हजार स्कूलों की बदली व्यवस्था

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रायपुर। 17 जून 2026| केंद्र सरकार ने शिक्षा के लिए नई गाइड लाइन जारी की थी और उसी हिसाब से छत्तीसगढ़ में शाला विकास समिति को नए फार्मेट में गठित करने का आदेश जारी हो गया है। अब तक शहर और गांवों में इन समितियों में अक्सर सत्तारुढ़ पार्टी के कार्यकर्ता स्थान पाते थे, क्योंकि समिति का फैसला जिले के प्रभारी मंत्री करते थे। प्रभारी मंत्री से यह काम छीन लिया गया है। इससे यह भी साफ है कि पहले की तरह समिति का राजनीतिकरण नहीं हो सकेगा।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम अच्छी शिक्षा और संस्कार के लिए बहुत अच्छा है। यदि समिति का गठन ईमानदारी से किया जाता तो बच्चों के साथ स्कूल को भी इसका लाभ मिलेगा। जिले के प्रभारी मंत्री की भिूमका नहीं रहने से छत्तीसगढ़ के करीब 40 हजार सरकारी स्कूलों की विकास समितियों में अब राजनीतिक नियुक्तियों और सिफारिशों की गुंजाइश लगभग खत्म हो जाएगी। राज्य सरकार ने नई व्यवस्था लागू करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि स्कूल प्रबंधन एवं विकास समिति (एसएमडीसी) की जगह बनने वाली नई स्कूल प्रबंधन समिति (एसएमसी) में प्राथमिकता विद्यार्थियों के माता-पिता, शिक्षाविदों, विषय विशेषज्ञों और समाज के प्रतिष्ठित लोगों को दी जाएगी। इस फैसले का सीधा असर उन राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं पर पड़ेगा जो अब तक स्कूल समितियों में जगह पाने के लिए सक्रिय रहते थे। अनुमान है कि प्रदेश के लगभग 40 हजार सरकारी स्कूलों के हिसाब से करीब दो लाख लोग ऐसे थे जो किसी न किसी समिति में सदस्य या पदाधिकारी बनने की उम्मीद लगाए बैठे थे। नई व्यवस्था ने उनकी संभावनाओं पर विराम लगा दिया है।
फैसले को ऐसे समझें
राजनीतिकरण समाप्त करने की दिशा में उठाए गए कदम को इस आदेश से ही समझा जा सकता है। नई गाइडलाइन के मुताबिक समिति के कुल सदस्यों में 75 प्रतिशत सदस्य विद्यार्थियों के माता-पिता या अभिभावक होंगे, जबकि शेष 25 प्रतिशत में स्थानीय निकाय के निर्वाचित प्रतिनिधि, शिक्षक, शिक्षाविद, विषय विशेषज्ञ, पूर्व विद्यार्थी, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, आशा कार्यकर्ता और एएनएम जैसी सामाजिक क्षेत्र से जुड़ी हस्तियां शामिल की जाएंगी। इसमें कहीं पर भी किसी राजनीतिक पार्टी या सांसद या विधायक प्रतिनिधि का जिक्र नहीं किया गया है। ऐसा माना जा रहा है कि इस व्यवस्था का उद्देश्य स्कूलों में समुदाय की भागीदारी बढ़ाना और राजनीतिक प्रभाव को कम करना माना जा रहा है। अब समिति का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष भी अभिभावकों में से ही चुना जाएगा।
स्कूल हित सर्वोपरि, राजनीति नहीं
शिक्षा विभाग के अधिकारियों का मानना है कि कई स्थानों पर समितियां राजनीतिक प्रभाव का केंद्र बन गई थीं, जबकि उनका मूल उद्देश्य स्कूलों के विकास और बच्चों की पढ़ाई से जुड़ी समस्याओं का समाधान करना था। नई व्यवस्था से निर्णय लेने में अभिभावकों और शिक्षा से जुड़े लोगों की भूमिका बढ़ेगी। अब विकास कार्य के लिए भी राजनीतिक लोगों की शरण में नहंी जाना पड़ेगा, इसका कारण यह है कि नई एसएमसी को एक लाख रुपये तक के निर्माण और मरम्मत कार्य कराने का अधिकार भी दिया गया है। शौचालय, पेयजल, बिजली, पंखे और अन्य छोटी मरम्मत जैसे कार्य समिति की निगरानी में कराए जा सकेंगे।
बच्चों के हित में बड़ा बदलाव
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नई व्यवस्था का ईमानदारी से पालन हुआ तो स्कूलों में राजनीतिक हस्तक्षेप घटेगा और अभिभावकों की जवाबदेही बढ़ेगी। इससे नामांकन, पढ़ाई की गुणवत्ता, ड्रॉपआउट रोकने, पोषण, स्वच्छता और बुनियादी सुविधाओं पर ज्यादा ध्यान दिया जा सकेगा।
फैक्ट फाइल
- प्रदेश में सरकारी स्कूल : लगभग 40 हजार
- समिति में 75% सदस्य अभिभावक होंगे
- 50% महिलाओं की भागीदारी अनिवार्य
- दो वर्ष का होगा कार्यकाल
- एक लाख रुपये तक के निर्माण कार्य का अधिकार
- करीब दो लाख राजनीतिक दावेदारों की उम्मीदों को झटका
- अब स्कूल हित और जनहित को प्राथमिकता देने की तैयारी

