सिर्फ 3 दिन नौकरी, 9 साल छुट्टी, महिला व्याख्याता बनी प्रमुख सचिव और जिपं सीईओ के लिए मुसीबत की सबब, हाई कोर्ट ने लगाई फटकार

बिलासपुर। यह मामला बताता है कि छत्तीसगढ़ में सरकारी नौकरी को लोगों ने किस तरह मजाक बना दिया है। एक महिला व्याख्याता कुल जमा तीन दिन नौकरी की। उसके बाद नौ साल गायब रही। इसके बावजूद किसी को सुध नहीं रहा कि इतने लंबे समय तक बिना बताए गायब रहने पर उसे सस्पेंड और बर्खास्त किया जाए। अब यह मामला ग्रामीण और पंचायत विभाग के लिए मुसीबत बन गया है। पंचायत विभाग इसमें इसलिए लपेटे में आया कि उस समय शिक्षाकर्मियों का संविलियन नहीं हुआ था। इस लिए पंचायत विभाग को पार्टी बनाया गया है।
यह मामला सूरजपुर जिले का है। आरती पाण्डेय का पहले शिक्षाकर्मी वर्ग-2 में नियुक्ति हुई थी, उसके बाद वे लेक्चचर चयनित हो गर्इ्र। लेक्चरर के तौर पर उन्होंने 15 सितंबर 2009 को ज्वाईन किया और 17 सितंबर 2009 के बाद स्कूल से बिना किसी को सूचना दिए गोल हो गई। इसके बाद वे सीधे 2018 में प्रगट हुईं। तब जाकर सिस्टम को होश आया और उन्हें सस्पेंड किया गया। 2020 में वे बर्खास्त भी हुई। सेवा समाप्ति के फैसले का उन्होंने हाई कोर्ट में चुनौती दी है। जस्टिस राकेश मोहन पाण्डेय की कोर्ट में इसकी सुनवाई चल रही है। कोर्ट ने 17 अगस्त को जिला पंचायत सीईओ को पक्ष प्रस्तुत करने बुलाया था। मगर सीईओ नहीं पहंुचे। इस पर कोर्ट इतना नाराज हुआ कि प्रमख सचिव पंचायत निहारिका बारिक से शपथ पत्र मांगने कह दिया था। हालांकि, बाद में फैसले में इसे शामिल नहीं किया।
जानिये क्या है मामला
सूरजपुर की रहने वाली आारती पाण्डेय 29 मई .2009 को लेक्चरर (शिक्षाकर्मी ग्रेड-1, गणित) के पद पर शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, जयनगर में नियुक्त किया गया था। उन्होंने 12 जून .2009 को तत्कालीन जिला पंचायत कार्यालय, सरगुजा में और 15 जून 2009 को प्राचार्य, शासकीय उच्च विद्यालय जयनगर में कार्यभार ग्रहण किया।
इस नियुक्ति से पहले वह ब्लॉक सूरजपुर के शासकीय माध्यमिक विद्यालय, कुंजानगर में शिक्षाकर्मी ग्रेड-2 के पद पर थीं, जिससे उन्होंने 11 जून 2009 को इस्तीफा दे दिया था।
तीन साल अनुपस्थित
व्याख्याता के तौर पर कार्यभार संभालने के बाद याचिकाकर्ता आरती पाण्डेय ने 15 जून 2009 से 17 जून 2009 तक (कुल 3 दिन) ही काम किया। इसके बाद नौ साल तक स्कूल से गायब रही। इसके बाद 23 जुलाई 2018 को अचानक स्कूल में प्रगट हई और स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए चिकित्सा प्रमाण पत्र के आधार पर उन्होंने ज्वाईन कराने की मांग की। उनका कहना था, खराब स्वास्थ्य के कारण वह स्कूल में अपनी सेवाएं नहीं दे पाईं।
प्रशासनिक कार्रवाई और निलंबन
आरती पाण्डेय की ज्वाईनिंग की फाइल जब जिला पंचायत पहुंची तो इतनी लंबी अवधि तक अनुपस्थित और कार्रवाई की जानकारी मांगी गई तो अफसरों के हाथ-पैर फुल गए। क्योंकि, उन्हें कोई नोटिस तक जारी नहीं की गई थी। इसके बाद सिस्टम हरकत में आया और आनन-फानन में उन्हें सस्पेंड किया गया।
आरोप पत्र, जांच और बर्खास्त
निलंबन के बाद आरती पाण्डेय को 12 अक्टूबर 2018 को आरोप पत्र जारी किया। मुख्य आरोप यह था कि बिना किसी पूर्व सूचना या अनुमति के याचिकाकर्ता 18.06.2009 से 23.07.2018 तक (कुल 9 वर्ष, 5 महीने और 1 दिन) ड्यूटी से अनुपस्थित रहीं, जिससे छत्तीसगढ़ पंचायत सेवा (आचरण) नियम, 1998 के नियम 3(1) (एक) (दो) (तीन) का उल्लंघन हुआ। याचिकाकर्ता ने व्यक्तिगत सुनवाई और चिकित्सा दस्तावेजों के साथ आरोप पत्र का जवाब दिया। विभाग द्वारा विभागीय जांच की गई, जिसमें आरोप सिद्ध पाए गए। इसके बाद उनकी सेवा समाप्त कर दी गई।
हाई कोर्ट में अपील
सेवा समाप्ति के आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता ने आयुक्त, सरगुजा संभाग, अंबिकापुर के समक्ष अपील की। उनका तर्क था कि विभागीय जांच बहुत जल्दी में की गई, सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया और सुप्रीम कोर्ट के नियमों (यथा- यूनियन ऑफ इंडिया बनाम राम लखन शर्मा और उत्तर प्रदेश राज्य बनाम सरोज कुमार सिन्हा) का पालन नहीं किया गया। अपीलीय प्राधिकारी ने 14 जुलाई 2022 को आरती पाण्डेय की अपील खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने बिलासपुर हाई कोर्ट में रिट दायर की है।

