Chhattisgarh me naxalwad ki puri kahani: छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद की पूरी कहानी; जानिए 1980 से 2026 तक का इतिहास

इमेज सोर्स- गूगल, एडिट बाय- NPG News
Chhattisgarh mein naxalvaad ki puri kahani: छत्तीसगढ़ राज्य अपने खनिज संपदा और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए तो जाना ही जाता है लेकिन यह राज्य नक्सलियों के गढ़ के रूप में भी प्रसिद्ध है। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में लगातार नक्सल उन्मूलन अभियान चलाए जा रहे थे साथ ही सुरक्षा कैंप स्थापित करके आम नागरिकों को सुरक्षा दी जाती थी। इस अभियान के तहत पिछले वर्ष शीर्ष नक्सली नेताओं के खिलाफ बड़ी कार्यवाही की गई, जिसमें सुरक्षा बलों को काफी हद तक सफलता मिली थी और केंद्रीय कमेटी साथ ही ब्यूरो स्तर के नक्सली नेता मारे गए थे। आज हम आपको बताएंगे छत्तीसगढ़ में 1980 से लेकर 2026 तक नक्सलवाद की पूरी टाइमलाइन!
1. छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद की शुरुआत, 1980
छत्तीसगढ़ के दंडकारण्य में नक्सलवाद का विस्तार 1980 में आंध्र प्रदेश के एक शिक्षक कोंडापल्ली सीतारमैया ने पीपुल्स वार ग्रुप (PWG) बनाकर की। इन्होंने दंडकारण्य के घने वन क्षेत्र को अपनी योजनाओं के विस्तार लिए चुना। छोटे-छोटे दलों में काम करते हुए इन्होंने नक्सलवाद का आधार तैयार किया और लोगों को जंगल में जीने की कला सिखाई।
2. पहली दर्ज हिंसक घटना, 1981
सन 1981 के समय छत्तीसगढ़ में सुकमा जिला के गोलापल्ली क्षेत्र में पुलिस पर हमला किया गया। इस हमले को बस्तर में नक्सली हिंसा की शुरुआत बताई जाती है। नक्सलियों द्वारा ऐसे हमले समय-समय पर अपने स्थानीय नेटवर्क को सक्रिय करने और लोगों में संगठन का डर बैठाने के लिए किया जाता था।
3. नक्सलवाद का फैलाव, 1980–1990
इस पूरे एक दशक में नक्सलवाद को छोटे-छोटे ’दलम’ बनाकर जंगलों में फैलने की शुरूआत की गई साथ ही स्थानीय युवाओं की भी भर्ती ’दलम’ में की जाने लगी। स्थानीय लोगों के दल में प्रवेश से आपस की भाषा और रास्तों की समझ अधिक होने लगी।
4. नक्सली संगठन का नेतृत्व परिवर्तन, 1993–2004
सन 1993 में माओवादी संगठन के भीतर नेतृत्व में परिवर्तन किया गया और गणपती उर्फ मुप्पला लक्ष्मण राव ने संगठन की कमान संभाली। सन 2000 में छत्तीसगढ़ की स्थापना हुई और बस्तर क्षेत्र नक्सलियों का प्रमुख गढ़ बन गया। इसी तरह सन 2004 में कोंडापल्ली सीतारमैया द्वारा निर्मित पीपुल्स वार ग्रुप (PWG) और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर के विलय से सीपीआई (माओवादी) का गठन हुआ। इस विलय के बाद नक्सली हिंसा काफी तीव्र गति से होने लगी।
5. सलवा जुडूम आंदोलन, 2005–2010
बस्तर के इतिहास का यह दौर काफी भयानक रहा है। नक्सलियों के आतंक को कम करने के लिए इसी समय सलवा जुडूम आंदोलन की शुरुआत की गई और यह वही समय है जब सुकमा के ताड़मेटला में नक्सलियों ने 76 सुरक्षा कर्मियों की हत्या कर दी थी।
6. झीरम घाटी हमला, 2013
छत्तीसगढ़ के इतिहास का यह सबसे बड़ा राजनीतिक हत्याकांड था। इसमें नक्सलियों ने कांग्रेस के शीर्ष नेताओं सहित 32 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। बताया जाता है कि इस समय सुकमा से होते हुए कांग्रेस की ’परिवर्तन यात्रा’ का काफिला वापस लौट रहा था तभी आईईडी से रास्ता रोककर नेताओं पर अंधाधुंध फायरिंग कर दी गई।
7. केंद्र और राज्य की संयुक्त रणनीति, 2014–2026
सन 2014 के बाद से केंद्र और राज्य सरकार की नक्सल विरोधी योजनाओं को तेज किया गया। स्थानीय स्तर पर खुफिया तंत्र, सुरक्षा कैंप, फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस और सड़क आदि की व्यवस्था की गई। आत्मसमर्पण और पुनर्वास जैसी अभियानों से नक्सलियों को मुख्य धारा में जोड़ने का कार्य किया गया। लगातार चलाए जा रहे इस अभियान में सैकड़ो नक्सली मारे गए साथ ही कईयों ने आत्मसमर्पण भी किया। अंततः 31 मार्च 2026 को सरकार ने यह घोषणा किया कि छत्तीसगढ़ में अब सशस्त्र नक्सलवाद का प्रभाव समाप्त हो चुका है।

