CG High Court News: दुष्कर्म पीड़िता का सनसनीखेज खुलासा: अदालत के सामने पुलिस की खुल गई पोल, पैरों तले खिसक गई जमीन!

बिलासपुर। 06 नवंबर 2026| छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के बहुचर्चित अपहरण, सामूहिक दुष्कर्म और मानव तस्करी के मामले में छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट के जस्टिस पीपी साहू व जस्टिस सुषमा सावंत की डिवीजन बेंच ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। रेप पीड़िता ने जब हाई कोर्ट के सामने बोलना शुरू किया तब पुलिस अफसरों के पैरों तले जमीन खिसक गई, किरकिरी हुई सो अलग। पुलिस की स्क्रिप्ट का सबसे भयावह पहलू ये कि निचली अदालत ने मुख्य आरोपियों को मृत्यु पर्यंत सजा सुनाई थी। शेष आरोपी आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे थे।
डिवीजन बेंच ने अपील पर सुनवाई के बाद निचली अदालत का दोषसिद्धि और सजा के फैसले को रद्द कर दिया है। मामले में पीड़िता ने जिरह के दौरान कोर्ट के सामने सनसनीखेज खुलासा करती हुई बताया, पुलिसकर्मियों ने उसे, उसकी मां और मौसी को एक कहानी सिखाई थी। अदालत ने पीड़िता के बयानों में विरोधाभास और घटना के समय उसकी उम्र, नाबालिग होने का पुख्ता प्रमाण नहीं मिलने को भी अहम आधार माना है।
पढ़िए क्या था मामला?
यह सनसनीखेज घटना जुलाई 2015 की है। रायपुर के गंज थाना और मुंगेली क्षेत्र से एक लड़की के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। पुलिस ने जांच के बाद आशीष सचदेव, गुलशन वाधवानी, शाहिना बेगम, संतोष केशरवानी, मोहम्मद रहीम राजा और रवींद्र विश्वास को आरोपी बनाया था।
मामले की सुनवाई के बाद रायपुर की विशेष सत्र न्यायालय ने 23 जुलाई 2016 को फैसला सुनाते हुए मुख्य आरोपियों को मृत्यु पर्यंत आजीवन कारावास और पॉक्सो अधिनियम के तहत 10-10 साल की सजा सुनाई थी। अन्य आरोपियों को मानव तस्करी और दूसरी धाराओं में दोषी करार देते हुए सजा दी गई थी। विशेष सत्र न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए छह आरोपियों ने अपने अधिवक्ताओं के माध्यम से छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट में अलग-अलग पांच आपराधिक अपील दायर की थी।
जिरह में पीड़िता का सनसनीखेज खुलासा- पुलिस ने सिखाई थी कहानी
आपराधिक अपील की सुनवाई के दौरान पीड़िता ने जिरह में खुलासा किया, पुलिसकर्मियों ने उसे, उसकी मां और मौसी को एक कहानी सिखाई थी। इसी आधार पर उन्होंने बाल कल्याण समिति और मजिस्ट्रेट के सामने बयान दिए थे। पीड़िता के अलग-अलग बयानों में विरोधाभास भी सामने आया। डिवीजन बेंच ने इन परिस्थितियों को देखते हुए उसके बयानों को अभियोजन के आरोपों की पुष्टि के लिए पर्याप्त विश्वसनीय नहीं माना।
नाबालिग होने का पुख्ता प्रमाण नहीं
डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान पाया, अभियोजन पक्ष ऐसा विश्वसनीय स्कूल रिकॉर्ड या वैधानिक दस्तावेज पेश नहीं कर सका, जिससे घटना के समय पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से कम साबित हो सके। जन्म प्रमाणपत्र भी घटना के करीब छह साल बाद जारी किया गया था। उसे जारी करने का पुख्ता आधार और स्रोत साबित नहीं किया गया। मेडिकल और फॉरेंसिक जांच में भी जबरदस्ती के आरोपों की पुष्टि करने वाले ठोस साक्ष्य नहीं मिले। अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्य भी अभियोजन के आरोपों को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं पाए गए।
हाई कोर्ट ने रद्द किया निचली अदालत का फैसला, रिहाई का दिया आदेश
डिवीजन बेंच ने अभियोजन पक्ष को आरोप संदेह से परे साबित करने में असफल मानते हुए आशीष सचदेव, गुलशन वाधवानी, शाहिना बेगम, संतोष केशरवानी, मोहम्मद रहीम राजा और रवींद्र विश्वास को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। हाई कोर्ट ने निचली अदालत का दोषसिद्धि और सजा का फैसला रद्द कर दिया है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि आरोपी किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए। जमानत पर चल रहे आरोपियों के मुचलके भी कोर्ट ने समाप्त कर दिया है।

