Bilaspur High Court News: हाई कोर्ट बोला: 'पब्लिसिटी स्टंट' के लिए लगाई जाने वाली छद्म जनहित याचिकाओं से न्याय व्यवस्था हाती है पंगु…

Bilaspur High Court News: हाई कोर्ट बोला: 'पब्लिसिटी स्टंट' के लिए लगाई जाने वाली छद्म जनहित याचिकाओं से न्याय व्यवस्था हाती है पंगु…

बिलासपुर। 1 जुलाई 2026| छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने राज्य के बहुचर्चित शराब घोटाले से जुड़ जनीहित याचिक PILको खारिज कर दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने जनहित याचिका को सारहीन मानते हुए सुरक्षा राशि को जब्त करने का आदेश दिया है।

डिवीजन बेंच ने साफ तौर पर कहा कि जब सक्षम एजेंसियां मामले की जांच कर रही हैं और कानूनी प्रक्रिया जारी है, तब पब्लिसिटी या निजी हितों के लिए अदालतों का समय बर्बाद करने वाली याचिकाओं को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता।

पढ़िए याचिकाकर्ता ने क्या की थी मांग?

धमतरी निवासी 64 वर्षीय पत्रकार और सार्वजनिक मामलों के विश्लेषक खिलावन चंद्राकर ने छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। याचिका में आरोप लगाया था कि राज्य के आबकारी ढांचे में प्रणालीगत विफलता है, जिसके कारण समानांतर अवैध शराब नेटवर्क चलाकर सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचाया गया।

याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट की निगरानी में एक स्वतंत्र उच्च-स्तरीय समिति या विशेष जांच दल (SIT) का गठन करने, घोटाले में नामजद डिस्टिलरी ऑपरेटरों, निर्माताओं और परिवहनकर्ताओं के लाइसेंस छत्तीसगढ़ आबकारी अधिनियम, 1915 की धारा 31 और 34 के तहत तुरंत निलंबित या रद्द करने शराब के अवैध परिवहन को रोकने के लिए क्यूआर-कोड (QR-Code) आधारित परमिट, वाहनों की जीपीएस (GPS) ट्रैकिंग और डिजिटल वेरिफिकेशन सिस्टम अनिवार्य करने व

साल 2019 के बाद से राज्य में संचालित सभी शराब निर्माताओं और डिस्टिलरियों का व्यापक फोरेंसिक और वित्तीय ऑडिट कराने की मांग की थी।

राज्य व केंद्र सरकार, ED के वकीलों ने दिया ये तर्क

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता शशांक ठाकुर, केंद्र सरकार के डिप्टी सॉलिसिटर जनरल रमाकांत मिश्रा और प्रवर्तन निदेशालय (ED) के अधिवक्ताओं ने जनहित याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि याचिकाकर्ता ने जिन आरोपों को आधार बनाया है, उन पर आर्थिक अपराध शाखा EOW/ACB और प्रवर्तन निदेशालय ED पहले ही प्राथमिकी FIR दर्ज कर जांच कर रही हैं। कई मामलों में कोर्ट के सामने चार्जशीट भी पेश की जा चुकी है, इसलिए इस याचिका का कोई औचित्य नहीं है।

विभाग को चलाना कार्यपालिका का काम है

याचिका की सुनवाई के बाद डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है, याचिकाकर्ता खुद स्वीकार कर रहा है कि EOW, ACB और ED जैसी सक्षम एजेंसियां इस मामले की जांच कर रही हैं और अदालत में मामले लंबित हैं। जब आपराधिक कानून पहले से ही अपना काम कर रहा है, तो कोर्ट द्वारा अलग से किसी समानांतर निगरानी या SIT के गठन की कोई आवश्यकता नहीं है।

जीपीएस ट्रैकिंग, क्यूआर कोड और डिजिटल वेरिफिकेशन जैसी मांगें पूरी तरह से शासकीय नीति का हिस्सा हैं। आबकारी विभाग को कैसे चलाना है और कौन सी तकनीक अपनानी है, यह कार्यपालिका का काम है। अदालत असाधारण परिस्थितियों के बिना सरकार के प्रशासनिक कार्यों की निरंतर निगरानी नहीं कर सकती।

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला

हाई कोर्ट ने जनहित याचिकाओं के बढ़ते दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट के ‘अशोक कुमार पांडेय बनाम पश्चिम बंगाल’ और ‘उत्तरांचल राज्य बनाम बलवंत सिंह चौफाल’ जैसे ऐतिहासिक फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा है, अदालतों का कीमती समय उन वास्तविक मुकदमों के लिए है जो वर्षों से कतार में हैं। ‘पब्लिसिटी स्टंट’ के लिए लगाई जाने वाली छद्म जनहित याचिकाओं से न्याय व्यवस्था पंगु होती है। कोर्ट ने जनहित खारिज कर दिया और याचिकाकर्ता द्वारा जमा की गई सुरक्षा राशि को राजसात करने का निर्देश दिया है।

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