Bilaspur High Court: बूथ लूटने की कोशिश: हाई कोर्ट बोला गंभीर अपराध, आरोप पत्र को रद्द करने की मांग को किया खारिज, कोर्ट ने कहा- पीठासीन अधिकारी शासकीय कर्मचारी हैं, झूठी शिकायत क्यों कराएंगे दर्ज

Bilaspur High Court: बूथ लूटने की कोशिश: हाई कोर्ट बोला गंभीर अपराध, आरोप पत्र को रद्द करने की मांग को किया खारिज, कोर्ट ने कहा- पीठासीन अधिकारी शासकीय कर्मचारी हैं, झूठी शिकायत क्यों कराएंगे दर्ज

Bilaspur High Court: बिलासपुर। छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोट के जस्टिस पीपी साहू व जस्टिस बीडी गुरु ने अपने आदेश में कहा है, बूथ लूटने और चुनाव कार्य में बाधा डालना गंभीर अपराध है, वह भी 100-150 की संख्या में मतदान केंद्र में घुसकर उत्पात मचाना बेहद डरावना है। डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता के उस आरोप को भी नकार दिया है जिसमें उसने राजनीतिक प्रतिद्वंदितावश झूठे आरोप में फंसाने की बात कही थी। डिवीजन बेंच ने कहा, पीठासीन अधिकारी लेक्चरर हैं, उनके साथ चुनाव कार्य करने वाले शिक्षक और शासकीय कर्मचारी हैं, वे झूठी शिकायत क्यों दर्ज कराएंगे।

पढ़िए क्या है मामला?

5 मार्च 2025 को खिलेश्वर राम ने संबंधित पुलिस थाने में लिखित शिकायत प्रस्तुत की, जिसमें आरोप लगाया था, जब वह रामचंद्रपुर गांव के बूथ संख्या 115 पर पंचायत चुनाव के कार्य में व्यस्त था, तब याचिकाकर्ता सहित 100-150 लोग वहां पहुंचे, मतदान केंद्र में घुस गए और उन्हें गंदी गालियां देते हुए बूथ के दो ताले तोड़ दिए और चुनाव सामग्री छीनने का प्रयास किया। इस घटना से उसे और चुनाव ड्यूटी पर तैनात अन्य सरकारी अधिकारियों के आधिकारिक कर्तव्य निर्वहन में बाधा उत्पन्न हुई। इसी शिकायत के आधार पर, पुलिस ने याचिकाकर्ता के खिलाफ एफआईआर दर्ज की।

पुलिस ने पेश किया आरोप पत्र, न्यायिक मजिस्ट्रेट ने लिया संज्ञान

याचिकाकर्ता और 100-150 अन्य लोगों के खिलाफ बीएनएस की धारा 331 (3), 296, 132, 174; सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से रोकने वाले अधिनियम 1984 की धारा 3 और छत्तीसगढ़ स्थानीय प्राधिकरण (चुनावी अपराध) अधिनियम, 1964 की धारा 7 (ख) के तहत मामला दर्ज किया गया था। जांच के दौरान, पुलिस ने बीएनएसएस की धारा 180 (धारा 161 सीआरपीसी) के तहत गवाहों के बयान और साथ ही पूरक बयान दर्ज किए और जांच पूरी होने पर, पुलिस ने न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष आरोप पत्र प्रस्तुत किया। कोर्ट ने 13 अक्टूबर 2025 को याचिकाकर्ता के खिलाफ उपरोक्त अपराध के लिए संज्ञान लिया।

याचिकाकर्ता ने आरोप पत्र को रद्द करने दायर की थी याचिका

याचिकाकर्ता मोहम्मद बक्स निवासी ग्राम अनिरुद्धपुर थाना जिला-बलरामपुर-रामानुजगंज ने प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट रामानुजगंज, जिला बलरामपुर रामानुजगंज के समक्ष दर्ज आरोप पत्र को रद्द करने की मांग की है, जो पुलिस थाना रामचंद्रपुर में उसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 3, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से बचाव अधिनियम 1984 की धारा 3 और छत्तीसगढ़ स्थानीय प्राधिकरण (चुनावी अपराध) अधिनियम, 1964 की धारा 7 () के तहत दंडनीय अपराध के लिए दर्ज एफआईआर से संबंधित है। याचिकाकर्ता ने 13 अक्टूबर 2025 के उस आदेश को भी रद्द करने की मांग की है जिसके द्वारा न्यायिक मजिस्ट्रेट ने पुलिस द्वारा प्रस्तुत अंतिम रिपोर्ट का संज्ञान लिया है।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कहा, राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के चलते फंसाया

याचिका की सुनवाई जस्टिस पीपी साहू व जस्टिस बीडी गुरु के डिवीजन बेंच में हुई। याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता अमरनाथ पांडेय ने कहा, याचिकाकर्ता को राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण इस अपराध में झूठा फंसाया गया है, क्योंकि वे लगातार दो बार जनपद पंचायत रामचंद्रपुर के सदस्य चुने गए हैं। उनका कहना है, 2025 के पंचायत चुनाव में याचिकाकर्ता ने राज्य में सत्ताधारी दल के उम्मीदवार को हराया था, जिससे वे याचिकाकर्ता से नाराज हो गए और इसलिए उन्होंने पीठासीन अधिकारी के साथ मिलकर याचिकाकर्ता के खिलाफ झूठी शिकायत दर्ज कराई। याचिकाकर्ता के खिलाफ एफआईआर घटना की तारीख से 10 दिन बाद यानी अत्यधिक देरी से दर्ज की गई है, और पूरी जानकारी होने के बावजूद, शिकायतकर्ता ने 10 दिन की देरी का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है। कथित घटना की रिपोर्ट करने में 10 दिन की देरी, विशेष रूप से तब जब पुलिस थाना, कथित घटना स्थल से महज 500 मीटर की दूरी पर स्थित है, जो स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि एफआईआर कोई तात्कालिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह विचार-विमर्श और गहन चिंतन का परिणाम है।

एडिशनल एजी आशीष शुक्ला ने ये कहा

राज्य शासन की ओर से पैरवी करते हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता आशीष शुक्ला ने कहा, याचिकाकर्ता के विरुद्ध एफआईआर पंचायत चुनाव ड्यूटी में लगे पीठासीन अधिकारी द्वारा दर्ज कराई गई लिखित शिकायत के आधार पर दर्ज की गई है। जांच पूरी होने के बाद, सक्षम न्यायालय में आरोपपत्र दाखिल किया गया और निचली अदालत ने अपने समक्ष उपलब्ध सामग्री पर उचित विचार करने और विवेकपूर्ण निर्णय लेने के बाद सही ढंग से संज्ञान लिया है।

याचिकाकर्ता पर है गंभीर आरोप, नियमों का किया उल्लंघन

याचिका की सुनवाई के बाद डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है, एफआईआर और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री की जांच करने पर, इस न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता पर शिकायतकर्ता और अन्य लोग, जो चुनाव ड्यूटी पर थे, आधिकारिक कर्तव्य पालन में बाधा उत्पन्न करने के स्पष्ट और विशिष्ट आरोप हैं। शिकायत में विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि याचिकाकर्ता ने 100-150 व्यक्तियों के साथ मिलकर नियमों का उल्लंघन किया।

ताले खोलकर, रामचंद्रपुर गांव के मतदान बूथ संख्या 115 में प्रवेश किया, चुनाव ड्यूटी पर तैनात सरकारी अधिकारियों को गंदी गालियां दीं और चुनाव सामग्री छीनने की कोशिश भी की।

सरकारी कर्मचारी हैे, लेक्चरर हैं, झूठी रिपोर्ट क्यों लिखाएंगे

डिवीजन बेंच ने कहा, याचिका के साथ संलग्न दस्तावेजों की जांच करने पर यह स्पष्ट है कि शिकायतकर्ता मतदान केंद्र संख्या 115 के पीठासीन अधिकारी हैं। वे सरकारी कर्मचारी हैं और व्याख्याता के पद पर कार्यरत हैं। शिकायतकर्ता के साथ चुनाव ड्यूटी में लगे अन्य कर्मचारी भी शिक्षक हैं। आंगनबाड़ी केंद्र के रसोइए का बयान भी बीएनएसएस की धारा 180 के तहत दर्ज किया गया है। इस स्तर पर संपूर्ण सामग्री की जांच करने पर, हम याचिकाकर्ता के वकील के इस तर्क को स्वीकार नहीं कर सकते कि उनके विरुद्ध दर्ज की गई रिपोर्ट दुर्भावनापूर्ण है। यह साक्ष्य का विषय है।

पढ़िए कोर्ट ने याचिका को खारिज करने के साथ क्या कहा है?

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए डिवीजन बेंच ने कहा, आपराधिक कार्यवाही को समाप्त करने या रद्द करने के चरण में, उच्च न्यायालय का यह कार्य नहीं है कि वह लघु परीक्षण करे और साक्ष्यों का मूल्यांकन करे। यह कार्य केवल निचली अदालत का है। उच्च न्यायालय को केवल यह विचार करना होता है कि प्रथम दृष्टया साक्ष्य मौजूद हैं या नहीं। वर्तमान मामले में, एफआईआर में लगाए गए आरोप; जांच के दौरान एकत्रित और अंतिम रिपोर्ट के साथ प्रस्तुत साक्ष्य, प्रथम दृष्टया अपराधों के घटित होने का संकेत देते हैं और मामले में साक्ष्यों के आधार पर निर्णय की आवश्यकता है। हमें एफआईआर, आरोपपत्र और याचिकाकर्ता के विरुद्ध पुलिस द्वारा प्रस्तुत अंतिम रिपोर्ट पर संज्ञान लेने वाले 13 अक्टूबर 2025 के आदेश को रद्द करने का कोई ठोस आधार नहीं मिलता है। इस टिप्पणी के साथ डिवीजन बेंच ने याचिका को खारिज कर दिया है।

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