वन अधिकार पट्टा को लेकर हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: कोर्ट ने कहा- दावा लंबित तो आदिवासी को जंगल की जमीन से नहीं हटा सकते

वन अधिकार पट्टा को लेकर हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: कोर्ट ने कहा- दावा लंबित तो आदिवासी को जंगल की जमीन से नहीं हटा सकते

बिलासपुर। 09 अगस्त 2026| छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट के जस्टिस एके प्रसाद ने वन अधिकार कानून और पट्टा को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, वन अधिकार कानून के तहत किसी आदिवासी के दावे की प्रक्रिया लंबित है और उसका नाम पात्र हितग्राहियों की सूची में शामिल किया जा चुका है, तो उस प्रक्रिया के अंतिम रूप से पूरा होने से पहले उसे वन भूमि से बेदखल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने भारतीय वन अधिनियम के तहत जारी बेदखली के नोटिस को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने वन विभाग को याचिकाकर्ता के प्रकरण का 120 दिनों के भीतर निराकरण का निर्देश दिया है।

कोर्ट ने कहा है, वन अधिकार अधिनियम, 2006 की धारा 4(5) के तहत वन भूमि पर काबिज अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति को उसके वन अधिकार की मान्यता और सत्यापन की प्रक्रिया पूरी होने तक बेदखल करने पर वैधानिक रोक है।

पढ़िए क्या है मामला?

छत्तीसगढ़ कोंडागांव जिले के मुलमुला निवासी बुधराम ने वन विभाग की कार्रवाई को चुनौती देते हुए छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका के अनुसार वह अनुसूचित जनजाति समुदाय से है, कई दशकों से संबंधित वन भूमि पर कब्जा कर खेती करते हुए परिवार का जीवनयापन कर रहा है। वन अधिकार अधिनियम लागू होने के बाद अधिकारियों ने ग्राम पंचायत और संबंधित समितियों के माध्यम से भूमि का सर्वे व सत्यापन कराया था।

याचिका के अनुसार वर्ष 2012-13 में तैयार पात्र हितग्राहियों की सूची में उसका का नाम शामिल किया गया। वन अधिकार पट्टा जारी करने की प्रक्रिया काफी आगे बढ़ चुकी थी और केवल औपचारिकताएं पूरी होना शेष था। इसके बावजूद दक्षिण कोंडागांव वन मंडल के अधिकारियों ने 15 सितंबर 2022 और 17 अक्टूबर 2022 को भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 80-ए के तहत उसे जमीन खाली करने के नोटिस जारी कर दिए।

वन विभाग ने बताया अवैध कब्जा

राज्य सरकार की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता ने कहा, संबंधित जमीन संरक्षित वन क्रमांक 679 का हिस्सा है। बुधराम सहित अन्य लोगों ने वन भूमि पर अवैध कब्जा किया है। मामले में 12 अगस्त 2022 को प्रारंभिक रिपोर्ट भी दर्ज की गई थी।

सरकार ने यह भी बताया कि बुधराम ने पूछताछ में वर्ष 1994-95 से जमीन पर कब्जे की बात कही थी, जबकि सैटेलाइट इमेजरी और गूगल मैप के सत्यापन से पता चला कि कब्जा वर्ष 2012-13 के बाद किया गया। वन विभाग के अनुसार करीब 0.516 हेक्टेयर संरक्षित वन भूमि पर अनधिकृत कब्जा था।

हाई कोर्ट ने कहा- पहले वन अधिकार का दावा तय करें

मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पाया कि सरकार के जवाब में ऐसा कोई स्पष्ट तथ्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि बुधराम का वन अधिकार अधिनियम के तहत दावा सक्षम प्राधिकारी ने अंतिम रूप से खारिज कर दिया है।

कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के दावे पर कब्जा अवैध है या नहीं, यह वन अधिकार अधिनियम के तहत गठित सक्षम समितियों द्वारा तय किया जाना है। ऐसे विवादित तथ्यों का अंतिम निर्धारण भारतीय वन अधिनियम के तहत शुरू की गई बेदखली की कार्रवाई के जरिए नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा: साथ दो विरोधाभासी कार्रवाई नहीं कर सकते अधिकारी

हाई कोर्ट ने कहा, जब अधिकारियों ने स्वयं वन अधिकार कानून के तहत सर्वे, सत्यापन और पात्र हितग्राहियों की सूची तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की थी, तो उसी प्रक्रिया को पूरा किए बिना भारतीय वन अधिनियम के तहत बेदखली की कार्रवाई शुरू करना उचित नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि दोनों प्रक्रियाएं एक साथ चलाकर वन अधिकार कानून के तहत दी गई वैधानिक सुरक्षा को निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता। वन अधिकार अधिनियम एक कल्याणकारी कानून है, जिसका उद्देश्य जंगलों में रहने वाले अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को दूर करना है।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, वन अधिकार अधिनियम की धारा 4(5) स्पष्ट रूप से प्रावधान करती है कि वन अधिकारों की मान्यता और सत्यापन की प्रक्रिया पूरी होने तक किसी पात्र वनवासी को उसकी काबिज वन भूमि से बेदखल नहीं किया जा सकता।

यह सुरक्षा केवल उन लोगों तक सीमित नहीं है, जिनका वन अधिकार अंतिम रूप से स्वीकार हो चुका है, बल्कि उन लोगों को भी प्राप्त है जिनका दावा अभी वैधानिक प्रक्रिया के तहत विचाराधीन है।

0 वन विभाग द्वारा बेदखली नोटिस को किया रद्द

हाई कोर्ट ने वन विभाग द्वारा 15 सितंबर 2022 और 17 अक्टूबर 2022 को जारी दोनों बेदखली नोटिस को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वन अधिकार के दावे का कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से परीक्षण करने, उसे सुनवाई का पूरा अवसर देने का निर्देश वन विभाग को दिया है। कोर्ट ने कहा, आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तिथि से 120 दिन के भीतर वन अधिकार के दावे की प्रक्रिया पूरी कर कारणयुक्त और स्पष्ट आदेश पारित करने का निर्देश दिया है।

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