बस्तर में बदल रही नई पीढ़ी की तकदीर, मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के प्रयासों से जनजातीय अंचल में अवसरों का विस्तार…

रायपुर। बस्तर की पहचान अब केवल जंगलों, दुर्गम रास्तों और लंबे समय तक हिंसा से प्रभावित रहे इलाकों तक सीमित नहीं है। इस क्षेत्र में शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण, खेल और रोजगार के नए अवसर एक अलग तस्वीर गढ़ रहे हैं। दंतेवाड़ा की जावंगा एजुकेशन सिटी में डॉक्टर बनने का सपना देखती बेटियां, डिजिटल कौशल के सहारे वैश्विक कंपनियों तक पहुंचते युवा और नारायणपुर के भाटपाल में पुराने सुरक्षा परिसर में रहकर पढ़ाई करते विद्यार्थी इस बदलाव की अलग-अलग कड़ियां हैं। इन पहलों की अहमियत केवल इस बात में नहीं है कि नए संस्थान बने या छात्रावास शुरू हुए। वास्तविक परिवर्तन तब सामने आता है, जब दूरस्थ गांव का बच्चा आर्थिक तंगी और आवागमन की कठिनाइयों के बावजूद अपनी पढ़ाई जारी रख पाता है। बस्तर में शिक्षा का यह विस्तार इसी चुनौती से मुकाबला करने का प्रयास है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार और केंद्र के सहयोग से संचालित योजनाएं स्थानीय युवाओं को बेहतर शिक्षा, कौशल और रोजगार से जोड़ने की दिशा में काम कर रही हैं।
जावंगा एजुकेशन सिटी: एक परिसर, अनेक संभावनाएं
दक्षिण बस्तर के दंतेवाड़ा जिले के जावंगा में स्थित अटल बिहारी वाजपेयी एजुकेशन सिटी इस बदलाव का प्रमुख उदाहरण है। करीब 150 एकड़ में फैले इस परिसर में 43 शैक्षणिक और आवासीय संस्थाएं संचालित हैं। यहां 7,436 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं, जिनमें 4,692 बालिकाएं हैं। इनमें से 5,370 विद्यार्थी परिसर के छात्रावासों में रहकर शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। दूरस्थ वनांचलों से आने वाले बच्चों के लिए सुरक्षित आवास, भोजन, नियमित पढ़ाई और मार्गदर्शन की उपलब्धता अपने आप में बड़ी सुविधा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस व्यवस्था से स्कूल छोड़ने वाले विद्यार्थियों की दर 50 प्रतिशत से घटकर 13 प्रतिशत रह गई है। यह बदलाव बताता है कि शिक्षा तक पहुंच बनाने के साथ विद्यार्थियों को संस्थानों से जोड़े रखना भी उतना ही जरूरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 9 मई 2015 को जावंगा पहुंचकर एजुकेशन सिटी का निरीक्षण किया था और विद्यार्थियों से संवाद किया था। एक दशक से अधिक समय बाद इस परिसर की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यहां शिक्षा को केवल स्कूली पाठ्यक्रम तक सीमित रखने के बजाय आगे की पढ़ाई, व्यावसायिक प्रशिक्षण और व्यक्तित्व विकास से जोड़ने का प्रयास किया गया है।
डॉक्टर बनने की राह पर जनजातीय बेटियां
दंतेवाड़ा की उन बेटियों के लिए चिकित्सा शिक्षा तक पहुंच विशेष महत्व रखती है, जिनके गांवों में कभी बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं भी पर्याप्त नहीं थीं। कारली स्थित ‘छू लो आसमान’ कन्या आवासीय कोचिंग केंद्र की छात्राओं ने नीट-यूजी में सफलता हासिल कर चिकित्सा और उससे जुड़े पाठ्यक्रमों में प्रवेश का रास्ता खोला है। सफल विद्यार्थियों को शासकीय संस्थानों में एमबीबीएस, आयुर्वेद, दंत चिकित्सा और पशु चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में आगे बढ़ने का अवसर मिला है। यह उपलब्धि केवल परीक्षा उत्तीर्ण करने की कहानी नहीं है। इससे उन परिवारों की आकांक्षाओं को भी बल मिलता है, जिनके लिए बेटियों को उच्च शिक्षा दिलाना कभी कठिन चुनौती था। हालांकि, इस सफलता को स्थायी बनाने के लिए आगे की पढ़ाई के दौरान आर्थिक सहायता, मार्गदर्शन और बेहतर शैक्षणिक वातावरण बनाए रखना भी जरूरी होगा।
डिजिटल कौशल से वैश्विक रोजगार तक
बस्तर के युवाओं के लिए तकनीकी शिक्षा रोजगार के नए रास्ते खोल रही है। जावंगा की एजुकेशन सिटी में संचालित नवगुरुकुल केंद्र में डेटा एनालिटिक्स और सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट जैसे क्षेत्रों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यहां से प्रशिक्षित करीब 100 युवा प्रतिष्ठित कंपनियों में रोजगार हासिल कर चुके हैं। एक छात्रा का एसएंडपी ग्लोबल में डेटा एनालिटिक्स के पद पर चयन इस बात का उदाहरण है कि उपयुक्त प्रशिक्षण मिलने पर दूरस्थ अंचलों की प्रतिभाएं भी वैश्विक कार्यक्षेत्र में जगह बना सकती हैं। इसी परिसर के औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान में डीजल मैकेनिक, फिटर, वेल्डर और इलेक्ट्रिकल जैसे ट्रेड में प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यहां के लगभग 95 प्रतिशत विद्यार्थी जनजातीय समुदायों से आते हैं। इन पाठ्यक्रमों की उपयोगिता तभी और बढ़ेगी, जब प्रशिक्षण को उद्योगों की मांग, नियमित कौशल आकलन और रोजगार उपलब्ध कराने वाली संस्थाओं के साथ प्रभावी ढंग से जोड़ा जाएगा।
खेल, शिक्षा और सुरक्षित बचपन का साझा मंच
एजुकेशन सिटी के एकलव्य खेल परिसर में तैराकी, घुड़सवारी, तीरंदाजी और इंडोर खेलों जैसी गतिविधियों के लिए सुविधाएं उपलब्ध हैं। यहां करीब 4,000 जनजातीय बच्चे खेल प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। खेल उन्हें शारीरिक दक्षता के साथ अनुशासन, टीम भावना और आत्मविश्वास विकसित करने का अवसर देते हैं। बालिका शिक्षा पर विशेष जोर भी इस परिसर की अहम विशेषता है। स्वामी आत्मानंद स्कूल में लगभग 1,200 छात्राएं कला, विज्ञान और वाणिज्य विषयों की पढ़ाई कर रही हैं। आवास, भोजन, पुस्तकालय और प्रयोगशालाओं जैसी सुविधाएं दूरस्थ गांवों के अभिभावकों का भरोसा मजबूत करती हैं। दंतेवाड़ा, बीजापुर और सुकमा जैसे जिलों के अनाथ और हिंसा से प्रभावित बच्चों के लिए आस्था विद्या मंदिर सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराने का प्रयास करता है।
यहां बच्चों की परिस्थितियों और जरूरतों को ध्यान में रखकर उन्हें शिक्षा, खेल, संगीत और सामान्य बचपन से जुड़ने का अवसर दिया जाता है। ऐसे संस्थानों की सफलता का आकलन केवल प्रवेश संख्या से नहीं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा, शिक्षा में निरंतरता और आगे के जीवन में उनकी प्रगति से भी किया जाना चाहिए। जावंगा की पहल को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, केपीएमजी ने इसे दुनिया की 100 नवाचारी परियोजनाओं में शामिल किया था। दंतेवाड़ा प्रशासन को प्रधानमंत्री उत्कृष्टता पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। यह पहचान बताती है कि स्थानीय जरूरतों के अनुरूप तैयार की गई व्यवस्था व्यापक स्तर पर भी महत्वपूर्ण मानी गई है।
उच्च शिक्षा में निवेश से खुल रहे नए रास्ते
बस्तर में शिक्षा का विस्तार जावंगा तक सीमित नहीं है। उच्च शिक्षा के बजट में 50 प्रतिशत वृद्धि के साथ राज्य सरकार ने इस क्षेत्र में संसाधन बढ़ाने पर जोर दिया है। ‘छू लो आसमान’, ‘ज्ञानगुड़ी’ और ‘हमर लक्ष्य’ जैसी पहलों के माध्यम से विद्यार्थियों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, मार्गदर्शन और आर्थिक सहयोग उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। जगदलपुर स्थित शहीद महेंद्र कर्मा विश्वविद्यालय को प्रधानमंत्री उच्चतर शिक्षा अभियान के तहत बहुविषयक शिक्षा एवं अनुसंधान विश्वविद्यालय यानी एमईआरयू योजना में 100 करोड़ रुपये का अनुदान मिला है। इस राशि से शोध केंद्र, आधुनिक प्रयोगशालाएं, डिजिटल लाइब्रेरी और कौशल विकास संबंधी सुविधाएं विकसित करने की योजना है। विश्वविद्यालय में 20 नए अध्ययन विभाग शुरू किए जाने की पहल भी स्थानीय विद्यार्थियों के लिए विषयों और शैक्षणिक विकल्पों का दायरा बढ़ा सकती है। फार्मेसी, विधि और शारीरिक शिक्षा जैसे रोजगारोन्मुखी पाठ्यक्रमों के साथ राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप चार वर्षीय एकीकृत शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम शुरू करने की दिशा में भी कदम उठाए जा रहे हैं।
‘इनोवेशन महाकुंभ’ जैसे आयोजन विद्यार्थियों में वैज्ञानिक सोच, उद्यमिता और नवाचार को प्रोत्साहित करने का माध्यम बन सकते हैं। शासकीय महाविद्यालयों के बुनियादी ढांचे के विकास के लिए 65 करोड़ रुपये की विशेष प्रशासनिक स्वीकृति दी गई है। जगदलपुर के काकतीय पीजी कॉलेज और कांकेर के इंदरु केंवट कन्या महाविद्यालय में पांच-पांच करोड़ रुपये की सहायता से सुविधाओं के विस्तार की योजना है। नगरनार और किलेपाल जैसे क्षेत्रों में नए शासकीय महाविद्यालयों की स्थापना भी उच्च शिक्षा को ग्रामीण और जनजातीय विद्यार्थियों के करीब लाने का प्रयास है। इन निवेशों का वास्तविक लाभ तभी सामने आएगा, जब संस्थानों में पर्याप्त शिक्षक हों, प्रयोगशालाएं नियमित रूप से संचालित हों, पाठ्यक्रम समय पर पूरे हों और विद्यार्थियों को पढ़ाई के बाद रोजगार या उच्च अध्ययन के अवसर मिलें। भवन और बजट जरूरी हैं, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता का निर्धारण अंततः कक्षाओं में होने वाले काम से होता है।
भाटपाल: सुरक्षा परिसर में अब गूंजती है पढ़ाई की आवाज
बस्तर में बदलाव की एक अलग तस्वीर नारायणपुर जिले के भाटपाल में दिखाई देती है। यहां करीब 15 वर्षों तक सुरक्षा बलों का ठिकाना रहे परिसर को विद्यार्थियों के छात्रावास के रूप में विकसित किया गया है। क्षेत्र के नक्सल प्रभाव से मुक्त होने के बाद जिला प्रशासन ने इस परिसर का उपयोग शिक्षा के लिए करने की पहल की। यह बस्तर संभाग में किसी पूर्व सुरक्षा कैंप को छात्रावास में बदलने का पहला ऐसा प्रयास बताया गया है। जिला मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित इस परिसर में 11 अगस्त 2026 से विद्यार्थियों के लिए आवासीय व्यवस्था शुरू हुई। शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, भाटपाल यहां से महज 50 मीटर की दूरी पर है।
इससे उन विद्यार्थियों को विशेष राहत मिली है, जिन्हें पहले स्कूल के पास रहने के लिए निजी आवास की व्यवस्था करनी पड़ती थी। राजबेड़ा से आने वाले कक्षा 12वीं के विद्यार्थी कोमेंद्र के लिए छात्रावास खुलने से परिवार का अतिरिक्त खर्च कम हुआ है। हलामीमुंजमेटा के कक्षा 9वीं के विद्यार्थी रितेश सोनी के लिए भी विद्यालय तक पहुंचना और साथियों के साथ रहकर पढ़ाई करना आसान हुआ है। ये अनुभव दिखाते हैं कि कई बार शिक्षा के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा पाठ्यपुस्तकों की कमी नहीं, बल्कि स्कूल तक पहुंचने और उसके आसपास रहने की व्यवस्था होती है।
कक्षा 6वीं से 12वीं तक आवास की सुविधा
भाटपाल परिसर में प्री-मैट्रिक और पोस्ट-मैट्रिक अनुसूचित जनजाति बालक छात्रावास संचालित हैं। प्री-मैट्रिक छात्रावास में कक्षा 6वीं से 10वीं तक के 114 विद्यार्थी रह रहे हैं, जबकि पोस्ट-मैट्रिक छात्रावास में कक्षा 11वीं और 12वीं के 39 विद्यार्थियों के रहने की व्यवस्था है। दसवीं के बाद पढ़ाई जारी रखने में दूरस्थ गांवों के विद्यार्थियों को अक्सर आवास और परिवहन की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। भाटपाल की व्यवस्था इन बाधाओं को कम करने की दिशा में उपयोगी कदम है। कलेक्टर नम्रता जैन ने छात्रावास का निरीक्षण कर भोजन, स्वच्छता, कमरों और अन्य बुनियादी सुविधाओं की स्थिति देखी तथा व्यवस्थाओं को बेहतर बनाए रखने के निर्देश दिए। छात्रावास की उपयोगिता केवल बिस्तर और भोजन उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। नियमित अध्ययन, खेल, स्वास्थ्य देखभाल, परामर्श और विद्यार्थियों की व्यक्तिगत जरूरतों पर ध्यान देने से ही आवासीय शिक्षा का उद्देश्य पूरा होगा।
बदलाव को स्थायी बनाने की चुनौती
जावंगा की एजुकेशन सिटी, जगदलपुर का विश्वविद्यालय और भाटपाल का छात्रावास एक साझा संदेश देते हैं: शिक्षा को विद्यार्थियों की वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप बनाया जाए, तो दुर्गम भूगोल और आर्थिक अभावों से पैदा होने वाली बाधाओं को कम किया जा सकता है। बस्तर में अब प्राथमिक शिक्षा से लेकर तकनीकी प्रशिक्षण, उच्च शिक्षा और खेल तक अवसरों का दायरा बढ़ाने की कोशिश हो रही है। फिर भी इन पहलों की दीर्घकालीन सफलता के लिए कुछ सवालों पर लगातार ध्यान देना होगा। क्या दूरस्थ गांवों के विद्यार्थियों की पढ़ाई बिना रुकावट पूरी हो रही है? क्या छात्रावासों में भोजन, सुरक्षा और स्वच्छता के मानक बने हुए हैं? क्या तकनीकी प्रशिक्षण पाने वाले युवाओं को उनके कौशल के अनुरूप स्थायी रोजगार मिल रहा है? क्या उच्च शिक्षा में लड़कियों की भागीदारी और पढ़ाई पूरी करने की दर लगातार बढ़ रही है? इन सवालों के जवाब ही विकास की वास्तविक तस्वीर सामने लाएंगे।
बस्तर के लिए सफलता का अर्थ केवल नए भवन, अनुदान या प्रशिक्षण केंद्र नहीं, बल्कि ऐसे विद्यार्थी हैं जो शिक्षा पूरी करें, आत्मनिर्भर बनें और अपने क्षेत्र के विकास में भागीदार बन सकें। जिस भाटपाल परिसर में कभी सुरक्षा व्यवस्था की जरूरतें सर्वोपरि थीं, वहां अब विद्यार्थी अपने भविष्य की तैयारी कर रहे हैं। जावंगा में जनजातीय बेटियां चिकित्सा शिक्षा की ओर बढ़ रही हैं और युवा डिजिटल दुनिया में अपनी जगह बना रहे हैं। ये उदाहरण बताते हैं कि अवसरों का विस्तार बस्तर की नई पीढ़ी के सामने संभावनाओं के नए द्वार खोल रहा है। अब जरूरत है कि इस बदलाव को निरंतरता, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और ठोस रोजगार परिणामों के सहारे स्थायी बनाया जाए।

