सिस्टम के आगे पस्त हो गया रिटायर कर्मचारी, पढ़िए हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को क्या दिया है निर्देश, रिटायरमेंट के 14 साल बाद भी नहीं मिली ग्रेज्युटी

सिस्टम के आगे पस्त हो गया रिटायर कर्मचारी, पढ़िए हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को क्या दिया है निर्देश, रिटायरमेंट के 14 साल बाद भी नहीं मिली ग्रेज्युटी

बिलासपुर। 15 अगस्त 2026| रिटायरमेंट के तकरीबन 14 साल बाद भी ग्रेच्युटी का भुगतान नहीं होने से परेशान 72 वर्षीय सेवानिवृत्त कर्मचारी को छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट से राहत मिली है। जस्टिस बीडी गुरु के सिंगल बेंच ने राज्य शासन के संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि कर्मचारी की ग्रेच्युटी के संबंध में लंबित अभ्यावेदन पर पांच सप्ताह के भीतर नियमानुसार निर्णय लिया जाए। मामला छत्तीसगढ़ बिलासपुर निवासी माखन लाल मार्को की याचिका से जुड़ा है। कोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी किए बिना याचिका को निराकृत कर दिया है।

पढ़िए क्या है मामाला?

याचिकाकर्ता माखन लाल मार्को जिला कोषालय कार्यालय, कोरबा में सहायक लेखापाल के पद पर कार्यरत थे। 30 जून 2012 को सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के समय उनके खिलाफ एक आपराधिक मामला लंबित था। इसी मामले में वर्ष 2017 में उन्हें दोषी ठहराया गया। याचिकाकर्ता का कहना था कि इसी आधार पर विभाग ने उनकी ग्रेच्युटी की राशि रोक रखी है। उनका तर्क था कि सेवानिवृत्ति से पहले उनके खिलाफ कोई विभागीय जांच शुरू नहीं की गई थी और वर्तमान में उन्हें पेंशन मिल रहा है। इसके बावजूद करीब 14 साल से ग्रेच्युटी का भुगतान लंबित है।

ग्रेच्युटी के साथ ब्याज की भी मांग

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता आशुतोष त्रिवेदी ने पैरवी करते हुए कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता कर्मचारी ने सेवानिवृत्ति की तारीख 30 जून 2012 से वास्तविक भुगतान तक ग्रेच्युटी की राशि पर 8 से 10 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दिए जाने की मांग की है। याचिका में कहा गया कि सेवानिवृत्ति के इतने लंबे समय बाद भी ग्रेच्युटी का भुगतान नहीं होना कर्मचारी के लिए गंभीर परेशानी का विषय है।

सरकार ने पांच सप्ताह में निर्णय का दिया भरोसा

सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से पैरवी करते हुए डिप्टी गर्वनमेंट एडवोकेट दीक्षा गौरहा ने कोर्ट को बताया कि यदि याचिकाकर्ता का अभ्यावेदन सक्षम विभाग के समक्ष लंबित है, तो उस पर नियमानुसार पांच सप्ताह के भीतर निर्णय लिया जाएगा।

राज्य शासन के जवाब के बाद कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि हाई कोर्ट के आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से पांच सप्ताह, 35 दिनों के भीतर याचिकाकर्ता के लंबित अभ्यावेदन पर कानून के अनुसार विचार कर अंतिम निर्णय पारित करें।

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