Chhattisgarh Tarkash 2026: अब जनवरी में ट्रांसफर

Chhattisgarh Tarkash 2026: अब जनवरी में ट्रांसफर

तरकश, 6 सितंबर 2026

संजय के. दीक्षित

आईएएस, आईपीएस और आईएफएस के ट्रांसफर का अब एक दौर कंप्लीट हो गया है। अगली लिस्ट अब जनवरी एंड तक निकलेगी। तब तक आईएएस का 2011 बैच सेकेट्री प्रमोट हो जाएगा. जनवरी में रायपुर पुलिस कमिश्नर संजीव शुक्ला रिटायर होंगे। उसी समय रायपुर में नए पुलिस कमिश्नर के साथ दुर्ग, भिलाई, कोरबा, जगदलपुर, मुंगेली के एसपी बदले जाएंगे। इसी तरह कलेक्टरों के तबादले भी अब जनवरी में ही होंगे। तब हो सकता है कि रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग तीनों जिलों के कलेक्टर चेंज हो जाएं। अब प्रश्न ट्रांसफर जनवरी में क्यों? तो संभवतः सरकार का प्रयास होगा…बड़े जिलों में ऐसे समय पर कलेक्टर, एसपी पोस्ट किया जाए, जो नवंबर 2028 में विधानसभा चुनाव कराएं। जनवरी में पोस्ट करने पर वे दो साल के खतरे से बच जाएंगे। वरना, चुनाव के दौरान उन पर तलवार लटकी रहेगी। जाहिर है, अक्टूबर में मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट प्रभावशील हो जाता है। और दोनों चरण की पोलिंग तक अफसरों की जान सांसत में रहती है। बहरहाल, जनवरी से पहले कोई हिट विकेट हो गया तो फिर बात और…तब तो सरकार को मजबूरी में हटाना पड़ेगा। वरना जनवरी में ही…।

कलेक्टरी में सबसे आगे

इस समय कलेक्टरी में छत्तीसगढ़ कैडर के आईएएस अधिकारी देश में सबसे आगे चल रहे हैं। बाकी राज्यों में आईएएस में सलेक्ट होने के बाद सात-आठ साल से पहले चांस नहीं मिलता। जबकि, छत्तीसगढ़ में इस समय 2019 बैच कलेक्टरी में कंप्लीट हो गया है। वहीं, बाकी कई राज्यों में अभी 2019 बैच शुरू नहीं हुआ है। सुनने में आ रहा, छत्तीसगढ़ में भी अब 2020 बैच को अगले साल ही जाकर मौका मिलेगा। तब तक इस बैच को डीएम बनने के लिए वेट करना होगा।

ओबीसी या ब्राम्हण चेहरा!

बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष किरण सिंहदेव अस्वस्थ चल रहे, इसलिए पार्टी के कामकाज को संभालने कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त करने की अटकलें बड़ी तेज़ हैं। हालांकि, खबर प्रदेश अध्यक्ष बदलने की उड़ गई थी…संवाद प्रमुख हेमंत प्राणग्राही को बयान जारी कर उसे खारिज करना पड़ा। अलबत्ता, ये अवश्य है कि पार्टी के अंदरखाने में कार्यकारी अध्यक्ष को लेकर बड़ा मंथन चल रहा। पब्लिक डोमेन में नाम भी कई लिए जा रहे…केंद्रीय मंत्री तोखन साहू से लेकर सांसद संतोष पाण्डेय, पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर, सांसद बृजमोहन अग्रवाल और पूर्व विधायक शिवरतन शर्मा तक। मगर भीतर की खबरों की मानें तो तोखन और संतोष का पलड़ा भारी दिखाई पड़ रहा। संतोष पाण्डेय का नाम चूकि संघ से बढ़ाया गया है, सो उनका नाम अपेक्षाकृत थोड़ा वजनी प्रतीत हो रहा। यूपी में विधानसभा चुनाव और वहां ब्राम्हणों की नाख़ुशी को देखते बीजेपी यह दांव चल सकती है। किंतु यह भी सही है कि बीजेपी अपने फैसलों से चौंकाती रहती है…कार्यकारी अध्यक्ष की नियुक्ति में भी ऐसा कुछ कर दें तो अचरज नहीं।

150 करोड़ में जीरो आईएएस

छत्तीसगढ़ के आदिवासी और अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों को आईएएस बनाने सरकार प्रति स्टूडेंट पौने दो लाख रुपए कोचिंग संस्था को भुगतान करती है। इसके लिए हर साल 200 बच्चों का सलेक्शन किया जाता है। पौने दो लाख को 200 से मल्टीप्लाई करें तो साल भर का सिर्फ कोचिंग फी हुआ साढ़े तीन करोड़। 25 साल का कैलकुलेट करें तो यह 87.50 करोड़ बैठेगा। इसके अलावा दिल्ली में आवास और खाने-पीने पर लाखों रुपए खर्च, वो अलग। मगर हासिल क्या आया, वो सबके सामने है। छत्तीसगढ़ में आदिवासी बच्चों को आईएएस बनाने का यह खेला पिछले 25 बरसों से चल रहा, मगर सिस्टम में बैठे लोगों को कभी पूछने का फुरसत नहीं मिला कि करोड़ों रुपए स्वाहा करने के बाद रिजल्ट क्यों नहीं मिल रहा। अब सुनने में आ रहा, सरकार कोचिंग में भीड़ बढ़ाने की बजाए सलेक्शन प्रॉसेज को ठीक कर अब सिर्फ 25 छात्रों को चुनेगी और कोशिश की जाएगी कि हर साल उनमें से दो-चार का यूपीएससी में सलेक्शन हो जाए। हालांकि, सरकार को ‘प्रयास” योजना का भी रिव्यू करना चाहिए। ‘प्रयास’ के तहत छत्तीसगढ़ में रायपुर, बिलासपुर समेत 18 जगहों पर आदिवासी बच्चों को जेई, आईआईटी की कोचिंग कराई जा रही। इसमें हर साल करीब 8000 बच्चों को सलेक्ट किया जाता है। सरकार एक स्टूडेंट पर 62 हजार रुपए पेमेंट करती है कोचिंग संस्था को। याने साल में करीब 49 करोड़। अब सवाल उठता है, इतने पैसे खर्च करने के बाद भी क्या अपेक्षित रिजल्ट आ रहा?

मंत्रालय में रिफार्म

मंत्रालय के कामकाज में कसावट लाने की दिशा में जीएडी बड़ा काम करने जा रहा है। ई-ऑफिस और ऑनलाइन अटेंडेंस के बाद मंत्रालयीन कैडर को स्ट्रांग किया जाएगा। अभी तो स्थिति ये है कि 80 परसेंट से अधिक सेक्शन ऑफिसर से लेकर अंडर सिकेट्री बाबू या भृत्य लेवल से प्रमोट हुए हैं। वो इसलिए कि मंत्रालय में प्रमोशन बड़ा फास्ट होता है, सो बाबू तो अफसर बन ही जाते हैं, भृत्य भी पीछे नहीं रहते। खैर, छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद अभी तक जूनियर सचिवालय सहायक पदों पर भर्ती होती थी। और वही बाद में प्रमोट होकर सीनियर सचिवालय सहायक और असिस्टेंट सेक्शन ऑफिसर बनते हैं। मगर अब सीधे असिस्टेेंट सेक्शन ऑफिसर पद पर भर्ती होगी। असिस्टेंट सेक्शन ऑफिसर ही प्रमोट होकर सेक्शन ऑफिसर और फिर अंडर सिकेट्री प्रमोट होंगे। जीएडी के अफसरों का मानना है कि इससे कामकाज की गुणवता सुधरेगी। बाकी राज्यों के मंत्रालयों में भी असिस्टेंट सेक्शन ऑफिसर पद पर ही भर्ती होती है। बहरहाल, जीएडी ने सेटअप रिवीजन के साथ कैडर रिवीजन के लिए तीन अफसरों की कमेटी बना दी है।

दीया तले अंधेरा!

सरकार ने पिछले दिनों एक महत्वपूर्ण आदेश निकाला था, उसमें कहा गया था कि अधिकारी, कर्मचारी का तीन साल में डेस्क बदलना अनिवार्य होगा। कहा ये भी गया…कामकाज की सहूलियत के लिए एक सिकेट्री के साथ एक अधीनस्थ रहेगा। यानी एक सिकेट्री के अधीन एक डिप्टी सिकेट्री। मगर मंत्रालय में एक डिप्टी सिकेट्री न केवल सात सालों से एक ही विभाग में जमे हैं बल्कि उनके पास पंजीयन, सामान्य प्रशासन विभाग, जीएसटी और विमानन जैसे अहम विभाग हैं। मतलब एक अफसर चार-चार विभाग। अफसर को नियमों का बड़ा जानकार माना जाता है, मगर अंग्रेजों के समय का सिस्टम अभी भी चल रहा तो फिर उनके ज्ञान का क्या मतलब? खैर, सिस्टम को समय रहते नए लोगों को तैयार करना चाहिए। इससे व्यक्ति विशेष पर निर्भरता नहीं रहती। पहले भी कई विभागों में ऐसे अफसर रहे, जिन्हें रिटायरमेंट के बाद भी संविदा में रखा गया…यह कहकर कि वे नहीं रहेंगे तो विभाग नहीं चल पाएगा। मगर 70 साल एज होने के बाद उनकी संविदा पोस्टिंग खतम हुई, तो भी विभाग चल रहा है। यानी मिथक टूट गया कि फलां नहीं रहेंगे तो काम नहीं हो पाएगा।

अफसर को नौ बार दस्त

किस्सा बड़ा मजेदार है…सिस्टम की पोल खोलने वाला भी। दरअसल, बिलासपुर हाई कोर्ट ने एक केस के सिलसिले में सूरजपुर जिला पंचायत के एक अफसर को 17 अगस्त को तलब किया था। अफसर ने कोर्ट के फरमान को हल्के में ले लिया। नहीं पहुंचे अदालत में। इस पर कोर्ट ने कंटेम्ट का नोटिस दे दिया, उपर से विभागीय प्रमुख होने के नाते प्रमुख सचिव पंचायत निहारिका बारिक से शपथ मांगने का आदेश भी। इसके बाद 2 सितंबर को जिपं अफसर कोर्ट पहुंचे। उन्होंने कहा, मैं बीमार हो गया था। हुजूर…दिन भर में नौ बार दस्त हो गया। सूरजपुर जिला अस्पताल में इलाज हुआ, डॉक्टर ने उन्हें 18 अगस्त तक ट्रेवल न करने की सलाह दी थी। उन्होंने डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल का मेडिकल सर्टिफिकेट भी कोर्ट में पेश किया। मगर जस्टिस तेज ठहरे। माजरा समझ गए। पहले भी वे कई बड़े अफसरों की क्लास ले चुके हैं। सो, जब सवालों की बौछारें शुरू हुई तो झूठ-पर-झूठ बोलते-बोलते अफसर एक जगह फंस गए। आखिर में उन्हें स्वीकार करना पड़ा कि उन्हें दस्त-वस्त कुछ नहीं था…अस्पताल से फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट बनवाए। बताते हैं, नौ बार लूज मोशन होने के बाद भी अफसर दिन भर ऑफिस में काम किए और यहीं से उनकी झूठ की परतें खुलती गई। खैर, अफसर बड़े थे, उन्होंने अपनी गलती मान ली, इसलिए कोर्ट ने उसे अपने आदेश में उल्लेख नहीं किया। मगर इससे मेडिकल सिस्टम और डॉक्टर भी सवालों के घेरे में हैं…आखिर, किस तरह वे स्वस्थ्य मुलाजिम को बीमार बना देते हैं।

डेढ़ सौ करोड़ का पटवारी

पीएससी परीक्षा घोटाले में ईडी ने दो सितंबर को दुर्ग के एक पूर्व पटवारी के कई ठिकानों पर छापा मारा। बताते हैं, ईडी को पीएससी स्कैम में पटवारी के कुछ लेनदेन के पेपर मिले हैं। यही नहीं, 150 करोड़ की संपत्ति की शिकायत भी। पूर्व पटवारी की तीन बेटियों में दो पटवारी हैं, एक सब रजिस्ट्रार। बेटा नायब तहसीलदार। याने पूरा कूनबा जमीन-जायदाद से संबंधित विभागों में। चारों जब से नौकरी पाए हैं, भिलाई-दुर्ग से बाहर नहीं निकले। बेटे का एक बार ट्रांसफर हुआ तो भिलाई के सारे बीजेपी, कांग्रेस नेता गोलबंद हो गए थे। ऊपर में इतने फोन हुए कि हफ्ते भर में ट्रांसफर आदेश चेंज करना पड़ा। पंजीयन मंत्री ओपी चौधरी ने पिछले साल जब सालों से जमे मुलाजिमों को बदला तो पूर्व पटवारी की बेटी का ट्रांसफर भी जांजगीर हो गया। उसके आदेश बदलने भी कहां-कहां से सिफारिशें नहीं हुई! सुनने में ये भी आ रहा कि पूर्व पटवारी के पास 150 करोड़ से कई गुना अधिक संपत्ति होगी। भिलाई के अनेक बिल्डरों के साथ उसका पार्टनरशिप है। जाहिर है, पूर्व पटवारी के आर्थिक और सियासी रसूख सुन सूबे के नौकरशाहों को ईर्ष्या हो रही होगी। यूपीएससी जैसी परीक्षा क्लियर कर देश की सबसे बड़ी सर्विस में आने के बाद भी कई आईएएस अफसर पूरी नौकरी में 150 करोड़ नहीं कमाते होंगे। और न वैसा सियासी रसूख…कि बीजेपी, कांग्रेस के नेताओं में उन्हें बचाने होड़ मच जाए।

अंत में दो सवाल आपसे

1. संतोष पाण्डेय और तोखन साहू में से कौन बनेगा छत्तीसगढ़ बीजेपी का कार्यकारी अध्यक्ष?

2. बीजेपी चिकित्सा प्रकोष्ठ का अध्यक्ष 24 घंटे में क्यों बदल गया?

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