Bilaspur High Court News: हाई कोर्ट बोला: महंगाई के दौर में दो हजार रुपये कतई ज्यादा नहीं है, पढ़िए क्या है मामला

बिलासपुर। 10 जुलाई 2026| छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा के सिंगल बेंच ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है, विवाह को विवादित बताकर पत्नी को भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने परिवार न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें पत्नी मंजू मनहर को दो हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण भत्ता देने का निर्देश पति को दिया है। कोर्ट ने कहा, वर्तमान महंगाई, चिकित्सा खर्च और दैनिक जीवन-यापन की बढ़ती लागत को देखते हुए दो हजार रुपये प्रतिमाह की राशि किसी भी दृष्टि से अधिक नहीं कही जा सकती।
पढ़िए क्या है मामला?
ग्राम बुंदेला, चकरभाठा निवासी आकाशदीप मनहर ने फैमिली कोर्ट के 23 फरवरी 2026 के आदेश को चुनौती देते हुए छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में बताया है, उसका और मंजू मनहर निवासी जरहाभाठा का कभी वैध विवाह हुआ ही नहीं। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा-7 के तहत आवश्यक धार्मिक रीति-रिवाज और सप्तपदी की रस्म पूरी नहीं हुई। मंदिर विवाह के समर्थन में न तो पुजारी की गवाही हुई और न ही विवाह की फोटो, वीडियो, निमंत्रण पत्र या अन्य वैधानिक साक्ष्य प्रस्तुत किए गए। पति ने यह भी दावा किया म्रहिला एकतरफा लगाव के कारण उसकी अनुपस्थिति में उसके घर आकर कुछ दिन रुकी थी, लेकिन दोनों कभी पति-पत्नी के रूप में साथ नहीं रहे। दूसरी ओर पत्नी मंजू मनहर, जो वर्तमान में जरहाभाठा में रह रही है, ने फैमिली कोर्ट में कहा कि दोनों ने मंदिर में विवाह किया था और पति ने कुछ समय तक उसे पत्नी के रूप में अपने साथ रखा। बाद में बिना किसी कारण के उसे छोड़ दिया और उसके भरण-पोषण की कोई व्यवस्था नहीं की। आर्थिक रूप से असहाय होने के कारण उसने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 (अब बीएनएसएस के समकक्ष प्रावधान) के तहत गुजारा भत्ता की मांग की।
फैमिली कोर्ट ने जारी किया गुजारा भत्ता देने का आदेश
फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों के बयान और उपलब्ध दस्तावेजी साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद पाया कि पत्नी प्रथम दृष्टया भरण-पोषण पाने की हकदार है। कोर्ट ने पति को दो हजार रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का आदेश पारित किया।
हाईकोर्ट ने इसलिए नहीं किया हस्तक्षेप
याचिका की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा के सिंगल बेंच में हुई। कोर्ट ने कहा, फैमिली कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का समुचित मूल्यांकन कर आदेश पारित किया है। पुनरीक्षण अधिकार क्षेत्र में तब तक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता, जब तक आदेश में स्पष्ट कानूनी त्रुटि या गंभीर विकृति दिखाई न दे। कोर्ट ने कहा, आज के समय में महंगाई, भोजन, आवास और चिकित्सा जैसे आवश्यक खर्चों को देखते हुए दो हजार रुपये प्रतिमाह की राशि बेहद मामूली है। इसे अत्यधिक या अनुचित नहीं कहा जा सकता। इसलिए फैमिली कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप का कोई औचित्य नहीं बनता।

