CG News: लोकतंत्र या सियासी 'दंगल'? छत्तीसगढ़ में राजनीतिक दफ्तरों का घेराव कर छेड़ दिया गया 'ऑफिस वॉर'!

रायपुर। 13 अक्टूबर 2026| सांसद राहुल गांधी के एक विवादित बयान को लेकर उभरे आक्रोश के बाद भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने राजधानी रायपुर स्थित प्रदेश कांग्रेस भवन सहित प्रदेशभर के कांग्रेस भवन का जिस तरह से घेराव किया, उसने सूबे की राजनीति में ‘कार्यालय युद्ध’ (ऑफिस वॉर) के जिन्न को एक बार फिर बोतल से बाहर निकाल दिया है।
सवाल उठता है कि क्या केवल एक बयान के विरोध में दफ्तरों को घेरना कोई नई घटना है? छत्तीसगढ़ में विपक्षी या सत्ताधारी दल के कार्यालयों को निशाना बनाने की यह परिपाटी अब मुख्यधारा की राजनीति का एक स्थायी और खौफनाक हिस्सा बन चुकी है।
छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास के पन्नों को पलटें तो साफ पता चलता है कि दफ्तरों के घेराव और घेराबंदी का यह खेल पिछले 15 से 20 सालों में लगातार आक्रामक होता चला गया है। सत्ता किसी भी दल की रही हो, विरोध जताने के लिए विरोधी दल के प्रदेश या जिला कार्यालयों को निशाना बनाना नेताओं के लिए अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का सबसे आसान तरीका बन गया है।
रमन सिंह सरकार का दौर (2018 से पहले): जब राज्य में लगातार 15 वर्षों तक भाजपा का शासन था, तब कांग्रेस, युवा कांग्रेस और एनएसयूआई के कार्यकर्ता आक्रामक रूप में रहते थे। उस दौरान भाजपा के प्रदेश मुख्यालय ‘एकात्म परिसर’, मंत्रियों के शासकीय बंगलों और कलेक्टर दफ्तरों का घेराव करना आम बात थी। धान खरीदी में देरी, बोनस का मुद्दा और किसानों की समस्याएं इस विरोध प्रदर्शन की मुख्य वजह हुआ करती थी।
भूपेश बघेल सरकार का दौर (2018-2023): सत्ता में बदलाव होते ही पासा पलट गया। कांग्रेस सरकार के पांच साल के दौरान भाजपा और उसके युवा संगठन (भाजयुमो) ने आक्रामक रुख अख्तियार किया। तत्कालीन भूपेश सरकार के खिलाफ शराब घोटाला, पीएससी घोटाला, गोधन न्याय योजना में भ्रष्टाचार और बेरोजगारी भत्ते जैसे संवेदनशील मुद्दों को लेकर भाजपा कार्यकर्ताओं ने राजीव भवन (कांग्रेस मुख्यालय) और मुख्यमंत्री निवास के घेराव के लिए कई बार हिंसक प्रदर्शन किए।
मौजूदा दौर (2024 से 2026 तक): अब जब राज्य में भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सरकार चला रही है, तब दोनों ही दल अपने पुराने हथकंडों को नए सिरे से धार दे रहे हैं। कभी राष्ट्रीय नेताओं के बयानों पर तो कभी स्थानीय प्रशासनिक मुद्दों पर, कांग्रेस भवन और भाजपा दफ्तरों के बाहर कार्यकर्ताओं का आमने- सामने होना अब रोजमर्रा की सियासत का हिस्सा बन चुका है।
सियासी दांव-पेच और आरोप-प्रत्यारोप: कौन इसे मानता है लोकतंत्र और कौन ‘गुंडागर्दी’?
इस तरह के उग्र घेरावों के पीछे दोनों ही प्रमुख दलों के पास अपने-अपने राजनीतिक तर्क और बचाव के रास्ते मौजूद हैं-
प्रदर्शनकारी दल का नजरिया: घेराव करने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं का दावा होता है कि जनविरोधी नीतियों, भ्रष्टाचार और राष्ट्रीय नेताओं के अपमान के खिलाफ जनता के गुस्से को प्रकट करने का यही एकमात्र लोकतांत्रिक रास्ता है। उनका मानना है कि जब तक सीधा और आक्रामक विरोध न दर्ज कराया जाए, तब तक सत्ता या विपक्ष के कान पर जूं नहीं रेंगती।
निशाने पर रहने वाले दल का हमला: दूसरी तरफ, जिस पार्टी के दफ्तर का घेराव किया जाता है, वह इसे सीधा ‘राजनीतिक बौखलाहट’, ‘गुंडागर्दी’ और ‘लोकतंत्र पर हमला’ करार देती है। इस दौरान दोनों पक्षों के प्रवक्ताओं के बीच चैनलों और सोशल मीडिया पर जमकर कीचड़ उछाला जाता है, जिससे जमीनी कार्यकर्ताओं का तनाव और बढ़ जाता है।
2011 से 2026: बीते 15 सालों के वे 6 बड़े राजनीतिक आंदोलन
छत्तीसगढ़ में केवल पार्टी दफ्तर ही नहीं, बल्कि सड़कों पर होने वाले बड़े जनांदोलनों ने भी राजनीति की दिशा तय की है। पिछले 15 वर्षों के 6 सबसे बड़े टकरावों पर एक नजर:
किसान आंदोलन और धान बोनस का घमासान (2012-2015): रमन सरकार के तीसरे कार्यकाल में धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य और बोनस को लेकर कांग्रेस ने पूरे प्रदेश में आंदोलन चलाया। कलेक्टोरेट घेराव और चक्काजाम के कारण कई जिलों में जनजीवन ठप हो गया था।
आदिवासी अधिकार और बस्तर में विरोध की आग (2016-2017): नक्सल मामलों, सलवा जुडूम के प्रभाव और भूमि अधिग्रहण के खिलाफ बस्तर व सरगुजा अंचल में सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों के संयुक्त तत्वावधान में विशाल रैलियां और आंदोलन किए गए।
कांग्रेस का ऐतिहासिक ‘जेल भरो आंदोलन’ (2018): विधानसभा चुनाव से ठीक पहले तत्कालीन रमन सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए कांग्रेस ने ‘जेल भरो आंदोलन’ और परिवर्तन यात्राएं निकालीं। इस आंदोलन में हजारों कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियों ने राज्य में सत्ता परिवर्तन की ठोस नींव रखी।
भाजयुमो का हल्ला बोल और पुलिस से सीधी भिड़ंत (2020-2023): भूपेश बघेल सरकार के खिलाफ भाजयुमो के राष्ट्रीय नेताओं की मौजूदगी में राजधानी रायपुर में हुए विशाल प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और कार्यकर्ताओं में तीखी झड़पें हुईं। वाटर कैनन और लाठीचार्ज के बीच कई बड़े नेता घायल भी हुए।
घोटाला और युवाओं का ऐतिहासिक उग्र प्रदर्शन (2023-2024): छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (सीजीपीएसपी) में धांधली और रिश्तेदारों के चयन के आरोपों के खिलाफ प्रदेश के हजारों बेरोजगार छात्र सड़कों पर उतर आए। इस युवा आक्रोश आंदोलन ने तत्कालीन कांग्रेस सरकार की छवि को गहरा नुकसान पहुंचाया।
केंद्रीय बयानों पर ‘कार्यालय युद्ध’ (2024-2026): वर्तमान समय में संसद में दी गई स्पीच या राष्ट्रीय स्तर पर उठने वाले राजनीतिक विवादों की आंच सीधे रायपुर और बिलासपुर के पार्टी दफ्तरों तक पहुंच रही है, जहां कार्यकर्ता सीधे एक-दूसरे की इमारतों पर धावा बोलने की कोशिश कर रहे हैं।
चुनावी ध्रुवीकरण का जरिया
समाजशा्त्रिरयों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन हिंसक घेरावों का मुख्य मकसद जनता से जुड़े असली मुद्दों को सुलझाना नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं में जोश भरकर चुनाव से पहले वोट बैंक का ध्रुवीकरण करना होता है। नैतिक, कानूनी और संवैधानिक कसौटी पर यदि ‘कार्यालयों के घेराव’ की इस परंपरा को परखा जाए, तो इसे किसी भी सूरत में स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी नहीं कहा जा सकता। छत्तीसगढ़ की राजनीति जिस दिशा में आगे बढ़ रही है, वहां मुद्दों की बहस की जगह ताकत के प्रदर्शन ने ले ली है। यदि राजनीतिक दलों ने अपनी इस ‘कार्यालय युद्ध’ की परिपाटी पर समय रहते लगाम नहीं लगाई, तो आने वाले दिनों में यह सियासी दुश्मनी किसी बड़ी अनहोनी या खूनी संघर्ष में तब्दील हो सकती है, जो छत्तीसगढ़ की लोकतांत्रिक साख पर एक गहरा धब्बा साबित होगी।

